सिरसी (उ.प्र.): अशूर के दिन सुर्ख़ होती है करामाती तस्बीह, साढ़े चार सौ साल पुरानी परंपरा बनी आस्था का प्रतीक
यह तस्बीह हर साल सुर्ख़ होकर गवाही देती है कि नवासा-ए-रसूल, इमाम हुसैन (अ.स.) को 10 मुहर्रम को तीन दिन का भूखा-प्यासा बेगुनाह शहीद कर दिया गया था


मोहम्मद युसूफ,सिरसी, उत्तर प्रदेश: कस्बे के एक प्राचीन और मशहूर आज़ाख़ाने में हर साल अशूर के दिन एक अद्भुत करामात देखने को मिलती है, जो लोगों की गहरी आस्था और यक़ीन से जुड़ी हुई है। “आज़ाख़ाना अज़ीज़ मोहम्मद मुतवल्ली”, जो कि मरहूम मंज़ूर हुसैन मुतवल्ली के मकान में स्थित है, वहाँ मौजूद एक ख़ास तस्बीह हर साल असर-ए-आशूर के वक़्त खुद-ब-खुद सुर्ख़ (लाल) हो जाती है।
इस तस्बीह को लेकर मान्यता है कि यह इराक़ के कर्बला शहर से लाई गई ख़ाक-ए-शिफ़ा (इमाम हुसैन अ.स. की क़ब्र की मिट्टी) से बनाई गई है। यह वही मुक़द्दस ख़ाक है, जिसे हज़रत मोहम्मद (स.अ.) ने बीबी उम्मे सलमा (र.अ.) को सौंपते हुए फ़रमाया था:
जिस दिन यह ख़ाक सुर्ख़ हो जाए, समझ लेना कि मेरा हुसैन शहीद कर दिया गया है।
हर साल यह करामात दोहराई जाती है, और असर-ए-आशूर पर तस्बीह का लाल हो जाना एक रूहानी अलामत माना जाता है। इसे देखने और ज़ियारत करने के लिए सिरसी ही नहीं, बल्कि आस-पास के गांवों और शहरों से भी बड़ी तादाद में अज़ादार पहुंचते हैं।
यह तस्बीह हर साल सुर्ख़ होकर गवाही देती है कि नवासा-ए-रसूल, इमाम हुसैन (अ.स.) को 10 मुहर्रम को तीन दिन का भूखा-प्यासा बेगुनाह शहीद कर दिया गया था। उनका कसूर सिर्फ़ इतना था कि उन्होंने ज़ालिम के आगे सर नहीं झुकाया, बल्कि ज़ुल्म और नाइंसाफी के खिलाफ आवाज़ बुलंद की।
यहां लोग अपने औलाद के लिए मन्नत मांगते हैं, तो कोई अपनी दुआओं की क़ुबूलियत के लिए हाज़िरी देता है। मान्यता है कि इस तस्बीह से जुड़ी मन्नतें जल्दी पूरी होती हैं और लोगों के मक़सद में बरकत आती है।
करीब 450 साल पुरानी यह परंपरा, आज भी सिरसी की शान और पहचान बनी हुई है। यह करामाती तस्बीह ना केवल ग़म-ए-हुसैन की याद ताज़ा करती है, बल्कि मोमिनों के दिलों में एक रूहानी एहसास भी पैदा करती है — कि हक़ की राह में जान देना ही असल शहादत है।





























