धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्य में व्यवधान करने वाले मानव तन में दानव हैं
स्वामी नारदानन्द ऋषि आश्रम में संपन्न हुआ 89वां भंडारा


जनता और जनादेश (फसी उर रहमान बेग)। मुरादाबाद. स्वामी नारदानंद ऋषि आश्रम में संपन्न हुए 89वें भंडारा के आयोजन पर मंगल चिंतन में बाबा संजीव आकांक्षी ने कहा कि धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यों में रत रहना और उन कार्यों में निरंतर आगे बढ़ते हुए, भगवान की कृपा हम पर है ऐसा मानकर कार्य करना मानव को श्रेष्ठ बनाता है और यह श्रेष्ठता का अनुभव और श्रेष्ठता का भाव ही परमात्मा के निकट बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान निभाता है. लेकिन समाज में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो किसी भी संस्था, स्थान या सामाजिक कार्यों में रुकावट उत्पन्न करने में उनका मन रहता है. ऐसे लोग नकारात्मक भाव से घनघोर रूप से भरे होते हैं. यह मानिए कि पूर्व जन्म की राक्षसी प्रवृत्ति इस जन्म में भी उन पर प्रभावी है, जो सात्विक और सकारात्मक व आध्यात्मिक और धार्मिक कार्यों में रुकावट बनते हैं, व्यवधान उत्पन्न करते हैं, वह मानवीय तो बहुत दूर है दानवीय कार्य कर रहे हैं, क्योंकि कलिकाल में एक ही शरीर में मानव और दानव दोनों ही वास करते हैं. हमारी प्रवृत्ति ही हमें मानव बनती है और हमारी प्रवृत्ति ही हमें दानव बनती है, जो लोग सात्विक कार्य में निरत हैं और अनेकों व्यवधान के बाद भी उन धार्मिक आयोजनों में, सात्विक आयोजनों में, जनकल्याण के कार्य में निरंतर लगे रहते हैं, वही श्रेष्ठ मनुष्य हैं l जो लोग ऐसे सात्विक, जन कल्याणकारी कार्यों में किसी भी रूप में व्यवधान उत्पन्न करते हैं वह दानवीय कार्य कर रहे हैं.
जीवन का उद्देश्य समाज के कल्याण, धर्म एवं जन की सेवा, आध्यात्मिक चिंतन के रूप से अपना कल्याण और अपने निकट आने वाले, परिजन, मित्र, बंधु-बांधव सभी को सात्विक कार्यों में लगा लेना ही श्रेष्ठ मनुष्य का कर्म है.
आज के मंगल चिंतन के उपरांत भंडारे का आयोजन किया गया. जिसमें प्रमुख रूप से डॉक्टर बृजपाल सिंह यादव सुरेंद्र सिंह पंकज शर्मा स्वामी नारदानन्द रसोई के संस्थापक बाबा संजीव आकांक्षी, सुमन गुप्ता, प्रमोद रस्तोगी, पंकज गुप्ता, मनोज गुप्ता, रुद्रांशी शर्मा, डॉली शर्मा, पंडित पुरुषोत्तम जी आदि का महत्वपूर्ण योगदान रहा.





























