तुम हमें मौत से डराते हो,तुमने नेजे पे सर नहीं देखा–दानिश ग़दीरी
शायरिस्तान फाउंडेशन के तत्वावधान में शानदार मुशायरा संपन्न, मुकामी व बेहरुनी शायरों ने पढ़ा कलाम

मोहम्मद यूसुफ( क्राइम डेस्क)।
सिरसी, 10 अक्टूबर — अदब और तहज़ीब के रंगों से सजी एक शानदार शाम का आयोजन शायरिस्तान फाउंडेशन के तत्वावधान में शायरिस्तान फाउंडेशन के कार्यालय शरीफुल हसन ज़ैदी के मकान पर किया गया, जिसमें स्थानीय (मुक़ामी) शायरों के साथ-साथ बेहरुनी शायरों ने भी अपने खूबसूरत कलाम पेश किए और खूब दाद पाई।

मुशायरे की शुरुआत असकरी जाफ़री द्वारा शम्मा जलाकर की गई, जिसके बाद मुशायरे का माहौल रौशन हो गया। कार्यक्रम की सदारत बुज़ुर्ग शायर रज़ी सिरसीवी ने की, जिन्होंने अपने अनुभव और शायरी से महफ़िल को और भी यादगार बना दिया। मंच संचालन की ज़िम्मेदारी जाने-माने अदबी शख्सियत हकीम बुरहान सम्भली ने निभाई, जिनकी रवाँ और दिलचस्प अंदाज़-ए-बयाँ ने श्रोताओं को बांधे रखा।
देर रात तक चले इस मुशायरे में बड़ी संख्या में शायरी प्रेमी और अदब के चाहने वाले उपस्थित रहे। हर शायर ने अपनी खास ग़ज़लों और शेरों से श्रोताओं का दिल जीत लिया। खासकर कुछ अशआर ने ख़ास मुकाम पाया और महफ़िल में बार-बार वाह-वाह की आवाज़ें गूंजती रहीं।
पेश किए गए कुछ चुनिंदा अशआर इस प्रकार रहे:
जब दुश्मनी की सारी हदों से गुज़र गए
फिर दोस्ती का हाथ बढ़ाने से क्या मिला
रज़ी सिरसीवी
मुंसिफी के नाम पर मासूमियत चीखी बहुत
उसने रिश्वत लेके जब मकतूल को क़ातिल लिखा
शफीकुर रहमान बरकाती
कोन जीतेगा लड़ाई फैसला कर लीजिए
एक तरफ कागज़ कलम है एक तरफ तलवार है
राना सिरसीवी
तुम हमें मौत से डराते हो
तुमने नेजे पे सर नहीं देखा
दानिश ग़दीरी
इस आशिकी ने काम अनोखा दिखा दिया
पत्थर को मोम मोम को पत्थर बना दिया
मेहदी सिरसीवी
उसी ने मेरे मक़ासिद की तर्जुमानी की
वो एक झूले में बच्चा जो बेज़बा था अभी
शुजाअत मेहदी सिरसीवी
किसकी यादों में जागते हो तुम
किसकी ख्वाबों की जिम्मेदारी है
डॉ शाकिर इस्लाही
दे गया चाबियां पड़ोसी को
अपने भाई का ऐतबार नहीं
हकीम बुरहान सम्भली
ये खुद ही गिरफ्तार मेरे इश्क में होगी
ज़ंजीर अगर बांधी गई मेरे कदम से
नूर सिरसीवी
इश्क ने अता की है क्या अजीब तासीरें
चीखना था कैदी को चीखती हैं जंजीरें
जैगम सिरसीवी
किसने कांटे बिछाए है माजिद
आदमी का शिकार करते हैं
हकीम अब्दुल माजिद हज़रत नगर गढ़ी
कैसे इल्ज़ाम लगाऊं मैं भला गैरों पर
मेरे अपने ही मेरे घर को जलाने आए
इस्लाम सिरसीवी
हमेशा रहती है आंखों में इसलिए सुर्खी
जो इनमें रहते थे वो सारे ख्वाब क़त्ल हुए
अब्बास सिरसीवी
कहां खिदमत अदब की हो रही है
फ़क़त पैसा कमाया जा रहा है
शमशाद अलीनगरी
ये प्यार फ़क़त दिल को ही करता नहीं बर्बाद
कर देता है ये जा का सफाया उसे कहना
मुदस्सिर नक़वी संभली
मैं एक शख़्स से दो बार जंग हारा हूं
मैं एक तीर का दो मर्तबा निशाना हुआ
महवर सिरसीवी
इस कदर दीवानगी का हो गया हम पर असर
अपने घर के सामने अपना पता करते रहे
ताहिर सम्भली
कितना बेगैरत बशर है बेटियों के सामने
बकता रहता है हमेशा गालियां बैठा हुआ
अकबर सिरसीवी
क़त्ल उसने भी तो करवाए थे लाखों लेकिन
क़त्ल उसका जो हुआ आपको हैरत क्या है
अता सिरसीवी
इस अदबी जलसे के समापन पर शायरिस्तान फाउंडेशन के जनरल सेक्रेटरी मेहदी सिरसीवी और सेक्रेटरी डॉ. शाकिर इस्लाही ने सभी मेहमानों, शायरों और श्रोताओं का दिल से शुक्रिया अदा किया। कार्यक्रम की सफलता का श्रेय पूरी टीम के साथ-साथ स्थानीय लोगों के उत्साह और मोहब्बत को भी दिया गया।
शायरिस्तान फाउंडेशन के अध्यक्ष दानिश ग़दीरी ने अपने संबोधन में कहा कि, “हमारा मक़सद उर्दू भाषा और शायरी की मिठास को जन-जन तक पहुँचाना है। इस तरह के कार्यक्रमों के माध्यम से हम उर्दू की सांस्कृतिक विरासत को ज़िंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं और यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।”
मुशायरे की सफलता ने यह साबित कर दिया कि उर्दू शायरी आज भी लोगों के दिलों में ज़िंदा है और इसकी खनक हर दिल को छूने की ताक़त रखती है। शायरिस्तान फाउंडेशन द्वारा आयोजित यह अदबी महफ़िल न सिर्फ़ एक यादगार शाम बनकर उभरी, बल्कि उर्दू अदब को नए आयाम देने की दिशा में एक अहम क़दम भी साबित हुई।





























