meesum zaidi
previous arrow
next arrow

Breaking
अन्जुमन-ए-तामीर इन्सानियत की ओर से मुरादाबाद में अज़ीमुश शान कॉन्फ्रेंस का आयोजनभीषण गर्मी के मद्देनजर,नागरिक सुरक्षा कोर द्वारा करूला पर शरबत वितरणएनएस ओने आज विश्व पुस्तक दिवस” को बड़े उत्साह के साथ मनायामुरादाबाद मुस्लिम डिग्री कॉलेज में भाषण प्रतियोगिता और ग़ज़ल सराई का आयोजन*माँ की सेवा में ही जन्नत है*” — *ठाकुर राजा रईस*  मेधावी छात्रों का सम्मान, अभिभावकों की उपस्थिति में हुआ परिणाम वितरण समारोह ✨यूनाइटेड वेलफेयर एंड डेवलपमेंट ट्रस्ट के पदाधिकारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने माननीय सांसद श्रीमती रुचि वीरा जी से उनके मुरादाबाद स्थित आवास पर शिष्टाचार भेंट कीसिरसी में ऑल इंडिया मुशायरा सफलतापूर्वक संपन्न,देशभर के कई नामचीन शायरों ने मुशायरे में शिरकत कीतालीम जिंदगी का एक अहम हिस्सा है :मिर्जा अरशद बेगभोजपुर में सरकार द्वारा नामित पार्षदों को मुबारकबाद देने पहुंचे यूपीका के डायरेक्टर

Uncategorized

एक दिन ऐसा भी आ सकता है लोग सांसों को खरीदें:शाहिद साहब

बहुत सी जगह आज भी लोग,ऑक्सीजन सिलेंडरों को पीठ पर लेकर घूमते है

Janta Aur Janadesh

 

 

शाहिद खान(लेखक,साहित्यकार)

शाहिद खान ( लेखक)।                           यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि हमारी राष्ट्रीय राजधानी दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानियों में शुमार है। दुनिया के बीस शीर्ष प्रदूषित शहरों में करीब आधे भारत में हैं। पर्व, आस्था व विश्वास अपनी जगह हैं, लेकिन प्राणवायु का स्वच्छ रहना लाखों लोगों के जीवन का प्रश्न भी है। यही वजह है कि दिल्ली-एनसीआर में कुछ शर्तों के साथ दीपावली पर ग्रीन पटाखों की अनुमति देते वक्त सुप्रीम कोर्ट ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की नसीहत दी है, जिससे हमारी आस्था का सम्मान हो सके और पर्यावरण की रक्षा भी हो। निस्संदेह, कोर्ट के फैसले से वे लोग उत्साहित होंगे, जो ग्रीन पटाखे चलाने की अनुमति चाहते थे। लेकिन इसका एक पक्ष यह भी है कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोग इससे निराश हो सकते हैं। पर्यावरण जाप्रेमियों की चिंता वाजिब है। अक्सर देखा जाता है कि ग्रीन पटाखे जलाने वालों पर नियामक एजेंसियां निगरानी नहीं रख पाती हैं। चिंता की बात यह भी है कि ग्रीन पटाखों के नाम पर घातक पटाखे भी जलाए जा सकते हैं। विगत के अनुभव बताते हैं कि अदालती रोक के बावजूद त्योहार पर जमकर आतिशबाजी हुई थी। दरअसल, कुछ लोगों की दलील थी कि पर्व विशेष पर ही प्रदूषण के नाम पर रोक लगाई जाती है, जिससे त्योहार का रंग फीका हो जाता है। कुछ लोगों ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न भी बना लिया। लेकिन सवाल यह है कि यह कैसे सुनिश्चित हो पाएगा कि ग्रीन पटाखों की आड़ में घातक पटाखे नहीं बेचे जा सकें। हमारी निगरानी करने वाली एजेंसियों व विभागों की कारगुजारियों पर अक्सर सवालिया निशान लगाए जाते हैं।

वैसे एक हकीकत यह भी है कि हर गली-मोहल्ले की दुकानों में प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों की निगरानी कर पाना व्यावहारिक भी नहीं है। इस बात को लेकर अक्सर बहस होती रही है कि परंपरागत रूप से दिवाली में पटाखों की अनिवार्यता नहीं रही है। निस्संदेह, दीप पर्व उजाले का उत्सव है, ताकि धरा पर कहीं अंधेरा न रह जाए, गरीब की झोपड़ी भी रोशन हो, समृद्धि हर घर तक पहुंचे। सही मायनों में पर्व सामूहिकता की भावना पर केंद्रित होते हैं। ऐसे में यदि हम घातक पटाखे जलाकर श्वास रोगों से पीड़ित मरीजों से लेकर आम आदमी को मुश्किल में डाल दें, तो यह पर्व का मर्म नहीं कहा जा सकता। वैसे ग्रीन पटाखों के बारे में भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उनके उत्पादन के दौरान निर्धारित मानकों का पालन किया गया हो। पटाखे जिस गुणवत्ता से बनते और बिकते हैं, कहना मुश्किल ही है कि वे वास्तव में पर्यावरण के अनुकूल होंगे। वैसे यह भी हकीकत है कि दिल्ली में हर साल ठंड की दस्तक के साथ बढ़ने वाले घातक प्रदूषण के लिए सिर्फ पटाखे ही जिम्मेदार नहीं होते। मौसम की प्रतिकूलता तथा जनसंख्या के बढ़ते घनत्व के कारण महानगरों में बहुमंजिला इमारतों के विस्तार से भी हवा का प्राकृतिक प्रवाह बाधित होता है, जिसके चलते प्रदूषण की परत दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी और निकटवर्ती शहरों के ऊपर छाई रहती है। निस्संदेह, पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यकर्ताओं के साथ-साथ आम नागरिकों को भी पटाखों के सीमित व संयमित उपयोग के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली व एनसीआर में ग्रीन पटाखे चलाने की अनुमति देने के फैसले के आलोक में कहा जा सकता है कि शेष देश में भी प्रदूषण रोकने के लिए गंभीर पहल की जानी चाहिए। देश के कई अन्य बड़े शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में दर्ज हैं। वहीं दूसरी ओर केवल सर्दियों में ही प्रदूषण नियंत्रण की पहल नहीं की जानी चाहिए। यह साल भर निरंतर चलने वाली प्रक्रिया बननी चाहिए। इसके अलावा जरूरी है कि प्रदूषण फैलाने वाले अन्य कारकों पर नियंत्रण किया जाए। हम अक्सर पटाखे व पराली जलाने पर जिम्मेदारी डालकर अन्य प्रदूषण के कारकों के विभाजन के बाद लाहौर से शिमला व अंबाला होते हुए यह समाचार पत्र अब चंडीगढ़ से प्रकाशित हो रहा है।

‘द ट्रिब्यून’ के सहयोगी प्रकाशनों के रूप में 15 अगस्त, 1978 को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दैनिक ट्रिब्यून व पंजाबी ट्रिब्यून की शुरुआत हुई। द ट्रिब्यून प्रकाशन समूह का संचालन एक ट्रस्ट द्वारा किया जाता है।

हमें दूरदर्शी ट्रस्टियों डॉ. तुलसीदास (प्रेसीडेंट), न्यायमूर्ति डी. के. महाजन, लेफ्टिनेंट जनरल पी. एस. ज्ञानी, एच. आर. भाटिया, डॉ. एम. एस. रंधावा तथा तत्कालीन प्रधान संपादक प्रेम भाटिया का भावपूर्ण स्मरण करना जरूरी लगता है, जिनके प्रयासों से दैनिक ट्रिब्यून अस्तित्व में आया।


Janta Aur Janadesh

जनता और जनादेश

जनता और जनादेश समाचार पत्र वेब पोर्टल एवं वेबसाइट विश्वसनीय खबरों का एक ऐसा निष्पक्ष प्लेटफार्म है जिसके माध्यम से जनता और जनादेश ग्रुप इसके संपादक फसी उर रहमान बैग द्वारा हमेशा निष्पक्षता से खबरों के प्रकाशन में अपनी एक हम किरदार अदा करके इस देश को पत्रकारिता की मुख्य धारा से जोड़ने का काम किया जा रहा है l

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!