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उत्तरप्रदेश

जातिगत जनगणना देश हित में केंद्र सरकार का अहम कदम,भूपेंद्र चौधरी

भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष चौधरी द्वारा प्रेस वार्ता कर ,विस्तार से जातिगत जनगणना के बारे कहा कि केंद्र में नरेंद्र मोदी जी की सरकार द्वारा एक ऐसा अहम फैसला लिया गया,जिसका पूर्व की सरकार हमेशा से विरोध करती थी

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    प्रेस वार्ता कर जातिगत जनगणना के बारे में जानकारी देते,भाजपा प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी

  सलमान यूसुफ।                 (यूपी हेड/फसी उर रहमान बेग ( संपादक)

जनगणना को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ऐतिहासिक कदम बताया. उन्होंने कहा की भाजपा कभी भी जातिगत जनगणना का विरोध नहीं किया बल्कि कांग्रेस की सरकारे हमेशा जाती जनगणना के विरोध में रही है. कर्नाटक की सरकार ने भी जो जातिगत सर्वें कराया वह भी अभी तक सर्वजानिक नहीं किया है. भाजपा की सरकार ने बिहार में हुए जातिगत सर्वें का समर्थन किया था. कांग्रेस और इंडी गठबंधन के दलों ने जाति जनगणना के विषय को केवल अपने राजनैतिक लाभ के लिए उपयोग किया. आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राजनैतिक विषयों की कैबिनेट समिति यह निर्णय लिया है कि जातियों की गणना को आने वाली जनगणना में सम्मिलित किया जाए. इसी बिषय को लेकर आज भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने सर्किट हॉउस में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर देश में होने वाली जनगणना के साथ जातिगत जनगणना पर जानकारी देते हुए कहा कि वर्तमान सरकार देश और समाज के सर्वांगिक हितो और मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध है.कांग्रेस की सरकारों ने आज तक जाति जनगणना का विरोध किया है. आजादी के बाद की गयी सभी जनगणनाओं में जातियों की गणना नहीं की गयी. आजादी के बाद यह पहली बार है कि प्रॉपर सही तरीके से जनगणना साथ जाति जनगणना कराई जा रही है.2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने लोकसभा में आश्वासन दिया था कि जाति जनगणना पर केबिनेट में विचार किया जाएगा. तत्पश्चात एक मंत्रिमण्डल समूह का भी गठन किया गया था. जिसमें अधिकांश राजनैतिक दलों ने जाति आधारित जनगणना की संस्तुति की थी. इस समूह में शामिल केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने 2011 की जनगणना में जाति को शामिल करने का विरोध किया और कहा कि जातियों की गिनती जनगणना में नहीं, बल्कि अलग से कराई जाएगी. इसके बावजूद कांग्रेस व सरकार ने जाति जनगणना के बजाए एक सर्वे कराना ही उचित समझा जिसे सेस के नाम से जाना जाता है. इस पर 4893.60 करोड़ रुपये खर्च किए गए लेकिन जातिगत आँकड़े प्रकाशित नहीं हुए, क्योंकि इसमें 8.19 करोड़ गलतियां पाई गई. 28 जुलाई 2015 को सरकार ने इसके बारे में बताया था. कांग्रेस और इंडी गठबंधन के दलों ने जाति जनगणना के विषय को केवल अपने राजनैतिक लाभ के लिए उपयोग किया.

जनगणना का विषय संविधान के अनुच्छेद 246 की केंद्रीय सूची की क्रम संख्या 69 पर अंकित है और यह केंद्र का विषय है. हालांकि कई राज्यों ने सर्वे के माध्यम से जातियों की जनगणना की है. जहां कुछ राज्यो में यह पार्थ सूचारू रूप से संपन्न हुआ है वहीं कुछ अन्य राज्यों ने राजनैतिक दृष्टि से और गैरपारदर्शी ढंग से सर्वे किया है. इस प्रकार के सर्वे से समाज में भ्रांति फैली है.

मोदी सरकार के जातिगत जनगणना कराने के निर्णय से यह सुनिश्चित होगा कि समाज आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से मजबूत होगा और देश की भी प्रगति निर्बाध चलती रहेगी. इन सभी स्थितियों को ध्यान में रखते हुए और यह सुनिश्चित करते हुए कि हमारा सामाजिक ताना बाना राजनीति के दबाव में न आये, यह जरूरी था कि जातियों की गणना एक सर्वे के स्थान पर मूल जनगणना में ही सम्मिलित होना चाहिए. इसके पहले भी जब समाज के गरीब वर्गों को 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया समाज के किसी घटक में तनाव उत्पन्न नहीं हुआ था. भाजपा ने कभी भी जातिगत जनगणना का विरोध नहीं किया. भाजपा ने बिहार में भी जाति जनगणना का समर्थन किया था. गृह मंत्री श्री अमित शाह जी ने भी कई मौकों पर स्पष्ट किया कि भाजपा इसके खिलाफ नहीं है. 18 सितंबर 2024 को केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह जी ने जनगणना पर बोलते हुए कहा था कि इस संबंध में सरकार के फैसले को जनगणना की घोषणा के समय सार्वजनिक किया जाएगा. कांग्रेस, आरजेडी या किसी भी इंडी गठबंधन की सरकार ने जातिगत जनगणना नहीं कराया. कांग्रेस की कर्नाटक सरकार ने जातिगत सर्वे कराया था लेकिन आजतक इसे सार्वजनिक नहीं किया गया. वैसे भी कांग्रेस की सरकारों ने जो जाति गणना के आंकड़े जुटाए थे, वो सर्वे के आधार पर थे, उसमें वैज्ञानिक प्रक्रिया का अभाव था, इसलिए उन डेटा पर विश्वास भी नहीं किया जा सकता. जातिगत जनगणना, जनगणना के साथ ही संभव हो सकता है. 2011 के बाद जनगणना 2021 में होनी थी लेकिन कोरोना के कारण जनगणना नहीं हो पाई। अब जब जनगणना हो रही है तो जातिगत जनगणना भी उसके साथ होगी. संघ ने भी सितंबर 2024 को स्पष्ट किया था कि किसी जाति या समुदाय की भलाई के लिए भी सरकार को आंकड़ों की जरूरत होती है. ऐसा पहले भी हो चुका है, लेकिन इसे सिर्फ समाज की भलाई के लिए किया जाना चाहिए.

साल 1931 तक भारत में जातिगत जनगणना होती थी. साल 1941 में जनगणना के समय जाति आधारित डेटा जुटाया ज़रूर गया था, लेकिन प्रकाशित नहीं किया गया. साल 1951 से 2011 तक की जनगणना में हर बार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का डेटा दिया गया, लेकिन ओबीसी और दूसरी जातियों का नहीं.

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