स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पुलिस,सामाजिक और कई राजनीतिक लोगो ने चादरपोशी कर मुल्क के लिए दुआएं मांगी
चादरपोशी करने वालो में पुलिस अधीक्षक रणविजय सिंह,सांसद रुचीवीरा के अलावा पूर्व मंत्री हाजी इकराम कुरेशी द्वारा शहीद ए वतन के मजार पर चादरपोशी की



फसी उर रहमान बेग (जज मीडिया)
शहिदे वतन नवाब मज्जू खा का नाम आता हे तो अंग्रजों की बरबय्रत का नकशा सामने आजाता है।जिस्ने अंग्रेजो की आंखो मे आंखें डालने की कोशिश कि अंग्रेजो ने उसको नेस्तो-नाबूद करने के लिये कोई हरबा ऐसा नही था जो इस्तेमाल न किया हो।जब मई 1857 ईस्वी मे नवाब सहाब अंग्रेजो को मुरादाबाद से निकालने मे कामयाब हो गये तो अंग्रेजो ने अपनी शिकस्त का इस तरह बदला लिया की नवाब सहाब को बदनांम करने के लिये उन पर अपनी औरतो के साथ बदसलूकी करने के

इलजामात भी लगा दिये।हालांकी नवाब मज्जू खा खानदानी नवाब ओर मुरादाबाद के शास्क थे।
उनका पुरा नाम मजीउददीन खा उर्फ नवाब मजजू खा था।उनके वालिद का नाम मोहम्मद दीन अहमद खा वल्द नवाब मोइनुददीन खा ।नवाब मज्जू खा बेशुमार दोलत के साथ साथ तोपखाने के भी मालिक थे। शासन उन्के हाथो मे था ।बस उन्हे अंग्रेजो की गुलामी मंजुर न्ही थी
वह भी अगर ज़मिरफरोश होते तो रामपुर नवाब की तरह अपनी जिंदगी ऐश से गुजार लेते।
चालाक ईसट इंडिया कंपनी अथर्रत अंग्रजो ने 10नवंबर 1801ई • के एक मुलायदे की आड मे लखनऊ के नवाब सआदत अली खा से अवध का आधा इलाका छीन लिया ।उस मुलायदे की रूह से जो जिले कमपनी को मिले,उनमे रोहिल्खणड का इलाका शामील था ।रोहिल्खंड को तीन जिलो मे बांट दिया गया ।जिला बरेली,जिला बदायूँ और जिला मुरादाबाद जिसे इलाके का मुख्य स्थान करार दिया गया ।
1801ई °मे ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपने जहरीले पन्जे पूरी तरह मुरादाबाद की रूह मे गढा दिये थे।
1802 में पहली बार Mr डब्लू लेसिस्टर नाम के अंग्रेज़ अफ़सर को यहाँ का पहला कलेक्टर बनाया गया, हालांकि ईस्ट इंडिया कम्पनी के ख़िलाफ़ बग़ावत के झंडे बुलन हो रहे थे और मुल्क अंग्रेज़ ईसाइयों से नफ़रत कर रहा था। लेकिन हर किसी की समझ मे नही आ रहा था।
हिन्दुस्तानियो में आत्मविश्वास की कमी आ गई थी फैसला करने की सलाहियत ख़तम सी हो गई थी। कुछ लोग इज़हारे नफ़रत कर रहे थे जिसका अंजाम सिवाय मौत के कुछ भी नही था। तो कुछ अंग्रेज़ो की ग़ुलामी कर रहे थे कुछ खामोश आँसुओ से ग़ुलामी की जंजीरों पर मातम कर रहे थे ओर कुछ बेहिसी के आलम में थे जिनका मक़सद दो वक्त की रोटी मुहैया करना और खा लेना था। न उन पर हालात का कोई असर था न ज़ुल्म का अंग्रेजों के ज़ुल्म सराहते सहते शायद वो ज़ुल्म का अर्थ भूल गए थे। ऐसे दौर में अंग्रेजों से टकराने की हिम्मत करना मौत को गले लगाना था, लेकिन मुरादाबाद को ये फख्र हासिल है कि यहाँ के कुछ जियालों ने सर से कफ़न बान लिया और अंग्रेजो से अपने वतन को आज़ाद कराने के लिए मौदान ए जंग में कूद पड़े। 9 मई 1857 को आज़ादी की पहली ऐलानिया जंग शुरू हुई 18 मई 1857 को अंग्रेजों ने रात के अंधेरे में आज़ादी के मतवालों पर हमला कर दिया और उनसे 10 हज़ार रुपये भी लूट लिए। 19 मई 1857 को नवाब मज्जू खां के नेतृत्व में ये जंग योजनाबद्ध आरम्भ हुई इसमे 29 वी बटालियन भी शामिल हो गई जिसका समाना अंग्रेज़ी कारिन्दे नही कर सके।
उधर वाहजुद्दीन उर्फ़ मोलवी मन्नू के नेतृत्व में इंक़लीबियो ने जेलखाना तोड़ दिया। ख़ौफ़ के मारे अंग्रेज़ जेलर डॉ हैन्स बरु जेल की छत पर छुपा रहा जिसे क्रांतिकारी पकड़ लाये और जेल के दरवाजे के साथ बांध कर आग लगा दी मगर जेलर वहाँ से किसी तरह भागने में कामयाब हो गया उसने अपने आला अधिकारियों को इंक़लबियो के हालात बताये तो इंक़लीबियो के हौसले सुन कर अंग्रेज़ो के पैर उखड़ गए और वो नैनीताल भाग गए। 3 जून 1857 तक सारा मुरादाबाद विदेशियो के वजूद से पाक हो चुका था।
इस जवानमर्दि और बहादुरी की वजह से नवाब मज्जू खा को बादशाह बहादुर शाह ज़फर की ओर से मुरादाबाद की सनद ए हुकूमत लिख दी गई जो जर्नल बख्त खान के माध्यम से 18 जून 1857 को हज़रत बहाउद्दीन फरीदी साहब रजबपुर में सौपी गई। अंग्रेज़ो को अपनी ये हर बर्दाश्त नही हुई उन्होंने मुरादाबाद पर आक्रमण की साज़िशें शुरू कर दी और रामपुर नवाब यूसुफ खा अंग्रेज़ो का ग़ुलाम और पिट्ठू था जो नवाब मज्जू खां के ख़िलाफ़ साज़िशें रचने लगा।
22 अप्रेल 1858 बहादुरशाह ज़फ़र के बेटे फिरूज़शाह जब मुरादाबाद आये तो नवाब रामपुर ने मुरादाबाद पर आक्रमण कर दिया और मुरादाबाद की अवाम पर अंग्रेज़ सिपाहा टूट पड़े और क़त्ल ए आम करने लगे जिसकी वजह फिरूज़शाह मुरादाबाद से बाहर निकल गए।
25 अप्रेल 1858 को सर क्रोक्राफ्ट विल्सन जज के मनहूस नेतृत्व में नवाब मज्जू खां साहब के एक नौकर की ग़द्दारी का सहारा ले कर 7 अंग्रेज़ सिपाही नवाब सहाब के महल में दाखिल हुए और नवाब साहब पर हमला कर दिया। उनसे नवाब साहब बडी बहादुरी से अकेले लड़े ओर सातों को मार गिराया। बाद में बड़ी तादाद में फ़ौज पहुँची और नवाब साहब पर हमला कर दिया जहाँ नवाब साहब को गोली लग गई और वो शहीद हो गए। उनके महल में निर्माण के लिए चुना पड़ा था उनके तड़पते हुए जिस्म को उस चूने में डाल दिया गया और चूने पर पानी डलवा दिया गया जिससे उनके जिस्म के चिथड़े उड़ गए और वहाँ मौजूद उन्ही के हाथी के पाँव से बंधवा कर गलशहीद पर हज़रत रौशन मिया वाले क़ब्रिस्तान में फिकवा दिया गया।
उनकी लाश को दफ़्न करने की भी इज़ाज़त न थी जिन बाबा साहब ने उनका कफ़न दफ़न किया उनको भी फांसी पर चढ़ा दिया गया।
इसी कब्रिसतान के सामने उनका भी मज़ार शरीफ़ है जो गलशहीद बाबा के नाम से मशहूर है।
गलशहीद का असली नाम गिल शहीद था।
गिल का फ़ारसी में मतलब होता है मिट्टी, इसलिए मुरादाबाद का ये मुहल्ला शहीदों की मिट्टी यानी गिलशाहीद के नाम से मशहूर हुआ जो वक़्त के साथ गलशहीद हो गया।
क्योंकि इसी जगह पर अंग्रेज़, आज़ादी के उन मतवालों को फाँसी दिया करते थे जिन्होंने बहादुर शाह ज़फ़र के बेटे फ़िरोज़ शाह के सामने विदेशियो से देश को आज़ाद कराने की क़सम खाई थी।1858 को नवाब मज्जू खान को शहीद करने के बाद चुन चुन कर इंक़लीबियो का साथ देने वालो को पेड़ो पर लटका दिया। आज भी यहाँ उन पेड़ो में से बचा एक पेड़ बाक़ी है जिन पर नवाब मज्जू खान का साथ देने वालो को फाँसी दी गई थी।
सन 2000 में शहीद ए वतन नवाब मज्जू खान मेमोरियल कमेटी मरहूम जावेद रशीद एडवोकेट के नेतृत्व में बनी, इसके बाद कमेटी ने कब्र की निशानदेही करने के बाद उस पर मज़ार बनवाया, 15 अगस्त, 26 जनवरी, 25 अप्रैल को हर साल ज़िलाधिकारी और अन्य प्रशासनिक अधिकारी मज़ार पर आकर श्रद्धांजलि देते हैं और कमेटी आने वालों का स्वागत करती है
वकी रशीद एडवोकेट
अध्यक्ष
शहीद ए वतन नवाब मज्जू खान मैमोरीयल कमेटी





























