जातीय जनगणना के बगैर पिछड़ा वर्ग का सामाजिक राजनैतिक आर्थिक व शैक्षिक विकास सम्भव नहीं :मुहम्मद अहमद
केंद्रीय सरकार को अविलम्ब इस शासनादेश को जमीन पर उतरना चाहिए जातिगत जनगणना से पिछड़े-अति पिछड़े वर्ग के शैक्षणिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को लेकर स्पष्टता आएगी और सरकार उनके लिए और मजबूती के साथ नीतियां बना पाएगी और यह कदम सामाजिक और आर्थिक समानता को बढ़ावा देगा, साथ ही नीति निर्माण में पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा यह कदम सामाजिक और आर्थिक समानता को बढ़ावा देगा, साथ ही नीति निर्माण में पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा। मुहम्मद अहमद ने कहा कि जातिगत जनगणना एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें देश की आबादी को उनकी जाति के आधार पर उनकी सही संख्या का पता चल जाये और आयु, लिंग, शिक्षा, रोजगार और अन्य सामाजिक-आर्थिक मापदंडों का न सिर्फ डेटा मिल जाता है


Mesum Zaidi (जनता और जनादेश)
अखिल भारतीय तेली महापंचायत उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड प्रभारी मुहम्मद अहमद ने प्रेस को जारी बयान में कहा कि जातीय जनगणना को लेकर लंबे वक्त से सामाजिक संगठन एवं राजनैतिक दल मांग कर रहे थे जिसे केंद्र सरकार ने मान तो लिया परंतु केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव को इसकी घोषणा 25 जून 2025 को की थी परन्तु कभी तक जमीन पर कोई कार्यवाही शुरू नहीं हुई है जबकि इसका पहला चरण 1 अक्तूबर 2026 से शुरू होनी की बात कही जा रही है केंद्रीय सरकार को अविलम्ब इस शासनादेश को जमीन पर उतरना चाहिए जातिगत जनगणना से पिछड़े-अति पिछड़े वर्ग के शैक्षणिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को लेकर स्पष्टता आएगी और सरकार उनके लिए और मजबूती के साथ नीतियां बना पाएगी और यह कदम सामाजिक और आर्थिक समानता को बढ़ावा देगा, साथ ही नीति निर्माण में पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा यह कदम सामाजिक और आर्थिक समानता को बढ़ावा देगा, साथ ही नीति निर्माण में पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा।
मुहम्मद अहमद ने कहा कि जातिगत जनगणना एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें देश की आबादी को उनकी जाति के आधार पर उनकी सही संख्या का पता चल जाये और आयु, लिंग, शिक्षा, रोजगार और अन्य सामाजिक-आर्थिक मापदंडों का न सिर्फ डेटा मिल जाता है और संख्या के अनुपात मे हिस्सेदारी सुनिश्चित हो जाएगी एकता को बढ़ावा मिले और जातिगत विभाजन को कम किया जा सकेगा जातिगत जनगणना सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित होगा जातिगत आंकड़े ना सिर्फ पिछड़ा वर्ग का सामाजिक राजनैतिक आर्थिक व शैक्षिक विकास मे कारगर साबित होंगे बल्कि विभिन्न समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेंगे जो भी जातियां शिक्षा, रोजगार, और स्वास्थ्य सेवाओं से ज्यादा वंचित हैं। इससे उनके लिए कल्याणकारी योजनाओं को और प्रभावी बनाया जा सकता है।
मुहम्मद अहमद ने कहा कि इसके अलावा ओबीसी और अन्य वंचित समुदायों की सटीक जनसंख्या के अभाव में, आरक्षण नीतियों को लागू करना और संसाधनों का उचित वितरण करना मुश्किल रहा है। मंडल आयोग (1980) ने ओबीसी की आबादी को 52% माना था, लेकिन यह अनुमान पुराने डेटा पर आधारित था। नए आंकड़े मे ओबीसी की आबादी को 70% माना था, इससे आरक्षण की सीमा और वितरण को और पारदर्शी बनाया जा सकता है और उन समुदायों की पहचान हो सकेगी जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे हैं। ।




















